
High Court: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट (High court) ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ कर दिया है कि यदि किसी महिला उसके पति की मृत्यु के बाद अनुकंपा के आधार पर नौकरी दी जाती है, तो वह पुनर्विवाह के बाद भी अपने मृत पति के माता-पिता को गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य है। हाई कोर्ट ने कहा कि दूसरे पति से पैदा हुए बच्चों के पालन पोषण का हवाला देकर पुराने सास-ससुर को गुजारा भत्ता देने से नहीं बचा जा सकता।
कोर्ट (High court) ने इस मांग को भी अस्वीकार कर दिया कि मृत पति के माता-पिता के पास एक और बेटा तथा खेती की जमीन है। यह सब होने के बावजूद पुनर्विवाह करने के वाली पत्नी को अपने पुराने सास ससुर को गुजारा भत्ता देना पड़ेगा।
हाई कोर्ट के जस्टिस राजबीर सेहरावत ने यह आदेश केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआइएसएफ) में कार्यरत एक महिला कांस्टेबल की याचिका को खारिज करते हुए दिए। महिला कांस्टेबल ने सीआइएसएफ के उस आदेश को रद करने की गुहार लगाई थी, जिसमें उसे अपने मृत पति के माता-पिता को अपने वेतन का 25 प्रतिशत भुगतान करने का निर्देश दिया गया था।
याचिकाकर्ता महिला के पति कुलदीप सिंह सीआइएसएफ में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत थे, जिनकी 13 फरवरी 1998 को मृत्यु हो गई। इन दोनों की केवल एक बेटी थी। बाद में याचिकाकर्ता महिला ने अपने पति कुलदीप सिंह की मृत्यु के कारण अनुकंपा नियुक्ति लिए खुद उत्तरदायी होगी। के लिए आवेदन किया। नियुक्ति नीति के अनुसार, सीआइएसएफ ने याचिकाकर्ता के लिए यह शर्त रखी कि वह अपने मृत पति के माता पिता का भरण-पोषण करेगी।
याचिकाकर्ता महिला कांस्टेबल ने इस बाबत सीआइएसएफ को अंडरटेकिंग दे दी कि वह मृत पति के माता-पिता की सेवा करेगी जिसके बाद उसे मई 2002 में करना नहीं है। सीआइएसएफ में महिला कांस्टेबल के रूप में नियुक्त किया गया था। इसके बाद याचिकाकर्ता महिला ने मार्च 2005 में दोबारा शादी कर ली। शुरुआत में याचिकाकर्ता अपने मृत पति के माता-पिता को एक हजार रुपये प्रतिमाह देती रही। बाद में याचिकाकर्ता द्वारा आनाकानी करने के बाद मृत पति के माता-पिता ने नियमित व् राशि बढ़ने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाई कोर्ट के निर्देश पर सीआइएसएफ ने पत्नी को अपने पहले पति की मां को उसके कुल वेतन का 25 प्रतिशत भुगतान करने का आदेश दिया था। इससे आहत महिला कांस्टेबल ने सीआइएसएफ के आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सभी पक्षों को सुनने के बाद, हाई कोर्ट ने कहा कि उसने अपने पति की मृत्यु का हर तरह का लाभ उठाया है, उसकी नौकरी भी पति की मृत्यु के कारण दी गई है। ऐसे में याचिकाकर्ता का कर्तव्य है कि वह अपने मृत पति की मां का ध्यान रखे। अगर ऐसा नहीं होता तो वह अपनी नौकरी खोने के लिए खुद उत्तरदायी होगी।
कोर्ट ने कहा कि उसके नियुक्ति पत्र में भी एक विशेष शर्त है कि यदि याचिकाकर्ता मृत पति के माता-पिता का भरण-पोषण करने में विफल रहती है तो उसकी सेवा समाप्त कर दी जाएगी। अपने विस्तृत आदेश में जस्टिस सहरावत ने कहा कि यह उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है कि केवल जीवित रखना देखभाल करना नहीं है।
जैसे याचिकाकर्ता ने स्वयं अपने लिए जीवन का तरीका अपनाया है, उन मानकों के अनुसार ही उसे मृत पति की मां की देखभाल करनी चाहिए थी। मृत पति की बूढ़ी मां को चिकित्सा देखभाल और वृद्ध जीवन से जुड़ी अन्य सुविधाओं के अलावा अतिरिक्त सुविधाओं की आवश्यकता है।
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